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Saturday, May 28, 2011

KUCCH LUV JAISAA REVIEW


कुछ ही दर्शक करेंगे ‘‘कुछ लव जैसा’’ को ‘‘लव’’
निर्माता-विपुल अमृतलाल शाह, कथा, पटकथा, संवाद, निर्देशन-बरनाली रे शुक्ला, एडिटर-हेमंती सरकार, सिनेमेटोग्राफी-बॉबी सिंह, बेकग्राउंड स्कोर-तपस रैला, संगीत-प्रीतम, गीतकार-इरशाद कामिल

इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्म‘‘कुछ लव जैसा’’एक छोटे बजट की फिल्म है। इस फिल्म में कोई भी नामचीन सितारा नहीं है। फिल्म के मुख्य किरदारों में राहुल बोस और शेफाली शाह हैं और यह दोनों भले ही स्टार नहीं हैं,पर दोनों ही बेहद कुशल कलाकार हैं।‘‘कुछ लव जैसा’’कहानी है दो अजनबियों की,जिनमें से कि एक गृहणी (हाउस वाइफ) है,जो कि अपनी जिं़दगी की बोरियत से दूर भागना चाहती है,और इस कहानी का दूसरा मुख्य किरदार एक अपराधी है जो कि पुलिस से भाग रहा है,और भागते-भागते ये दोनों अंजान एक दूसरे से जा मिलते हैं और फिर इन दोनों के साथ क्या होता है यही इस पूरी फिल्म में दिखाया गया है।इस फिल्म की कहानी आम मसाला हिन्दी फिल्मों से एकदम जुदा और नयापन लिये हुए है।इस फिल्म की कहानी बरनाली रे शुक्ला ने लिखी है,जो कि इस फिल्म की निर्देशक भी हैं।बतौर निर्देशक यह बरनाली रे शुक्ला की पहली फिल्म है।इससे पहले वह फिल्म‘‘थोड़ा लाइफ थोड़ा मेजिक’(2008)की कहानी लिख चुकी हैं और बतौर सह निर्देशक रामगोपाल वर्मा के साथ फिल्म‘‘सत्या’’(1998)और सुधीर मिश्रा,गोल्डी बहल,सृष्टि बहल और एकता कपूर(बरनाली ने एकता के लिए कुछ सीरियल लिखे हैं)जैसे नामी निर्माता निर्देशकों के साथ भी काम कर चुकी हैं।‘‘कुछ लव जैसा’’की कहानी तो बहुत रोचक है,पर इसका स्क्रीन प्ले(पटकथा)बेहद खराब लिखा गया है,जिसके कारण एक अलग और उमदा कहानी होने के बावजूद भी यह फिल्म बेहद बोरिंग और झिलाऊ लगती है।फिल्म की पटकथा(स्क्रीन प्ले)इसकी निर्देशिका बरनाली रे शुक्ला ने ही लिखा है और उनका लिखा गया स्क्रीन प्ले दर्शकों को ज़रा भी बांध नहीं पाता। अगर फिल्म का स्क्रीन प्ले अच्छा होता तो यह बेहद ही मजेदार फिल्म बन सकती थी। फिल्म के कुछ ही सीन दर्शकों को गुदगुदा पाते हैं,जैसे कि‘"वो कचरे वाले की घंटी वाला’’,जैसे कि वो सीन‘‘जिसमें दोनों मुख्य किरदार एक आदमी का पीछा कर रहे हैं और वह आदमी अपने मोबाइल पर पंडित जी से अपनी शादी के बारे में पूछ रहा है’’,जैसे कि वो सीन जिसमें ‘‘ऑफिस का बॉस अपने परेशान जूनियर को उसकी पत्नी से बात करते हुए देखता है’’जैसे कुछ सीन थोड़ी सी देर के लिए दर्शकों को गुदगुदाते हैं।इस फिल्म के डॉयलॉग्स(संवाद)ठीकठाक हैं और कुछ बेहद उमदा हैं,जो कि फिल्म की कहानी पर जचते हैं और असल जिंदगी के करीब भी लगते हैं,जैसे कि‘‘शादी के बाद बीवी चन्द्रमुखी, कुछ साल बाद सूरजमुखी,और वॉरंटी पीरियड खत्म होने के बाद ज्वालामुखी लगती हैं’’,‘‘लोग कहते हैं सदा सुहागन रहो, मतलब पति के पहले मर जाओ’’,‘‘लेडीज लोग 10 सेकंड में अपना माइंड बदलती हैं’’,‘‘लाईफ में जो भी सोचो उसको पूरी तरह परफेक्टली करो’’,‘‘पालक हमारे यहां तो दस रुपये में सिर्फ दो गड्डी मिलती हैं,यहां चार मिल रही हैं’’,‘‘शी इज सो हॉट शादीशुदा थोड़ी होगी’’,‘‘सुनाने वाले बहुत हैं,समझने वाला कोई नहीं’’,‘‘बहुत कम लोगों को रिस्क पर विश्वास करना आता है’’,‘‘सुबह जो हुआ वो हिस्ट्री है’’। इस फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर(बैकग्राउंड म्यूजिक)ठीकठाक है।वहीं फिल्म का संगीत भी फिल्म की कहानी के हिसाब से ठीक है।इस फिल्म के गीत फिल्म की कहानी को ध्यान में रखकर लिखे गए हैं,जो कि फिल्म की कहानी के हिसाब से ठीकठाक हैं।फिल्म का कैमरा वर्क औसत दर्जे का है।फिल्म में अभिनय की बात करें तो राहुल बोस ने कमाल का अभिनय किया है और उनको दिया गया किरदार उन पर जचता भी है,जिसमें वह नेचुरल लगते हैं। फिल्म में राहुल के अभिनय के लिए उनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम ही होगी,वहीं फिल्म में दूसरा मुख्य किरदार निभाने वाली शेफाली शाह ने भी अच्छा अभिनय किया है,पर फिल्म के कुछ सीन्स में वो ओवर एक्टिंग करती नजर आती हैं।फिल्म के बाकी कलाकारों में सुमित राघवन,मनमीत सिंह,कुनाल कुमार,अमीन हाजी,नीतू चन्द्रा और ओमपुरी सभी ने ठीकठाक अभिनय किया है।इस फिल्म की निर्देशक बरनाली रे शुक्ला की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है और इस फिल्म की कहानी,संवाद और पटकथा उन्होंने ही लिखी है।उनकी लिखी गई कहानी रोचक है और संवाद भी ठीकठाक है,पर उनका लिखा स्क्रीन प्ले और उनका निर्देशन बेहद की कमजोर है,जिसके कारण यह फिल्म उबाऊ लगती है। इस फिल्म में कई ऐसे संवाद और दृश्य हैं जिनका कोई लॉजिक नहीं है।उन इल्लॉजिक सीन्स और दृश्यों के कारण भी यह फिल्म पकाऊ लगती है।फिल्म के एक सीन में आप देखेंगे कि एक महिला शोरूम से नई कार खरीदती है और उसकी नंबर प्लेट पर कार का नंबर लिखा हुआ है,फिल्म के एक सीन में आपको कार में खुला रखा केक दिखायी देगा,असल जिंदगी में कोई किसी को खुला रखा केक कार में रखकर गिफ्ट करने नहीं ले जाता,फिल्म के क्लाईमेक्स में एक मां अपनी बच्ची से सेक्स के बारे में बात करती है।फिल्म की यह और ऐसी कई इल्लॉजीकल बातें इसके कमजोर निर्देशन के कारण है।आपमें से बहुत से लोग इस फिल्म की अंग्रेजी की स्पेलिंग देखकर सोचेंगे कि इसमें कुछ अक्षर अलग से क्यों जोड़े गए हैं,तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि इस फिल्म के निर्माता विपुल शाह हैं और उनका अंक ज्योतिष में गहरा विश्वास है।जिसके कारण इस फिल्म के नाम में कुछ अतिरिक्त अक्षर जुड़वाए गए हैं देश के जाने माने अंक ज्योतिष की सलाह से)जिससे की यह फिल्म अच्छी चले। इससे पहले भी विपुल शाह की‘‘वक्त’’,‘‘सिंह इज किंग’’,‘‘नमस्ते लंदन’’,‘‘लंदन ड्रीम्स’’और‘‘एक्शन रीप्ले’’आदि फिल्मों के नाम में भी उन्होंने देश के नामचीन अंक ज्योतिष की सलाह पर कुछ अतिरिक्त अक्षर जोड़े थे। इस फिल्म की हीरोइन और निर्माता निर्देशक विपुल शाह की पत्नी शेफाली शाह के नाम पर भी यदि आप गौर करें तो आपको उनके नाम में भी कुछ अतिरिक्त अक्षर दिखायी देंगे।अब यह विपुल की अपनी सोच है और कुछ पॉजीटिव करने के लिए ऐसा करना गलत नहीं,जिससे किसी दूसरे को हानि नहीं होती हो,बहरहाल‘‘कुछ लव जैसा’’की बात करो तो अगर आप कुछ हटकर फिल्म देखने का शौक रखते हैं या फिर आप राहुल बोस के प्रशंसक हैं और उनका उमदा अभिनय देखना चाहते हैं तो ही इस फिल्म को देखें,वरना मेरे ख्याल से तो‘‘कुछ लव जैसा’’को कुछ ही दर्शकों का लव मिल पाएगा।
फिल्म समीक्षक - अंकित मालवीय

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Tuesday, May 17, 2011

STANLEY KA DABBA

Saturday, May 14, 2011

RAGINI MMS REVIEW

HAUNTED REVIEW

Friday, May 6, 2011

LUV KA THE END REVIEW

Thursday, April 21, 2011

DUM MAARO DUM REVIEW

Friday, April 8, 2011

THANK YOU REVIEW

Friday, April 1, 2011

FALTU REVIEW

Friday, February 25, 2011

TANU WEDS MANU REVIEW

Thursday, February 17, 2011

7 KHOON MAAF REVIEW

Friday, February 11, 2011

PATIALA HOUSE REVIEW

Friday, February 4, 2011

YE SAALI ZINDAGI REVIEW





साली तो हैं,पर"जि़न्दगी नहीं"
निर्माता-प्रकाश झा,निर्देशक-सुधीर मिश्रा,लेखक-सुधीर मिश्रा,पटकथा-सुधीर मिश्रा,संवाद-सुधीर मिश्रा मनु ऋ षि,संगीत निर्देशक
निशात खान,अभिषेक रे,गीतकार-स्वानंद किरकिरे, मानवेंद्र, सिनेमाटोग्राफी-सचिन कुमार कृष्णन
इस शुक्रवार ‘ये साली जिन्दगंी’ रिलिज हुई, इस फिल्म के निर्देशक सुधीर मिश्रा है और इस फिल्म में ईरफान खान, अरूणोदय ङ्क्षसग, चित्रांगदा ङ्क्षसग और अदिति राव ने मुख्य भूमिका निभाई हैं, ‘ये साली जिन्दगी’ के निर्देक सुधीर मिश्रा की फिल्मों को पसन्द करने वाला एक खास वर्ग है, सुधीर मिश्रा की ‘इस रात की सुबह नहीं’ (1996) को फिल्म उद्योग के लोगों और फिल्म समीक्षकों ने खूब सराहा, पर उन्हें उनके द्वारा निर्देशित फिल्म हजारो ख्वाहिशे ऐसी 2005 से आम आदमी के बीच पहचान मिली, पर सुधीर मिश्रा की फिल्म ये साली जिन्दगी की बात करे तो इस फिल्म की कहानी में कई किरदार और कई टै्रक है, जिसके कारण यह फिल्म बेहद आडियन्स क्नयफ्यूज करती है फिल्म देखते समय दर्शक के लिए यह समझना बड़ा कठिन होता हैं कि फिल्म में कौन सा टै्रक चल रहा हैं, फिल्म के सभी किरदारों के आपस में किस से क्या संबन्ध है, और फिल्म में कभी भी कोई भी सीन आ जाता है, जिसका पिछले सीन से कोई संबंध नहीं है, उसी तरह पूरी फिल्म में थोड़ी-थोड़ी देर बाद नए-नए किरदार फिल्म की कहानी में आ जाते हैं, जिससे फिल्म को समझने में काफी दिक्कत आती है, इस फिल्म को देखते हुए ऐसा भी लगता हैं कि फिल्म में कुछ अलग-अगल कहानियां बनाकर उन्हें जबरदस्ती साथ में जोडऩे की कोशिश की गई है, वैसे तो किसी भी फिल्म में उसके शुरूआती 10-15 मिनिट या ज्यादा से ज्यादा आंधे घण्टे में उस फिल्म के किरदारों और कहानी को इस्टेबलिश कर दिया जाना चाहिए, ताकि दर्शक फिल्म की कहानी और उसके किरदारों को समझ कर फिल्म का मजा उठा सके, पर ‘ये साली जिन्दगी’ में फिल्म की कहानी और किरदारों को इस्टेबलिश होने में बहुत समय लगता है जिसके कारण दर्शक इस फिल्म से ऊब जाते है, इस फिल्म की कमजोर लिखाई, कमजोर पठकथा और सुस्त एडीटिंग के कारण ही यह फिल्म झिलाऊ लगी, हालकि इस फिल्म के संवाद अच्छे है, जिनमें बहुत से पर पचेज हैं जिनके कारण आपको हंसी आ जाएगी, जैसे ‘‘एक ईमानदार आदमी सबका नाम खराब करता है’’ , ‘‘तूने एक इंच जुबान खोली उसके बारे में तो मैं 1.5,1.5 इंच छेद करूंगा, पता भी नहीं कहा करूंगा’’, ‘‘कमाल है ये साली जिन्दगी गलत जगह पे सही चीज मिल गई’’, ‘‘इन्टरव्यूह ले रहे हो मेरा’’, ‘‘सारी अक्ल इसके पास है, और हम सारे चू...या हंै’’, ‘‘शादी श्रीदेवी से की थी निकली फूलन देवी’’,‘‘ मैंने आप के साथ कुछ तो किया जिसके कारण आपकों वो लगा जो लगा’’, ‘‘मुझे एक बात बता दे तू सगी किसकी है’’, ‘‘लोग सुनेगे तो क्या कहेगे की चु..या आशकी के चक्कर में मारा गया और लडक़ी भी नहीं मिली’’, ‘‘इश्क और बुलैट में कोई फर्क नही होता, दोनो छाती फाडक़र निकलती है’’, ‘‘ये तो उड़ता तीर ले लिया भाई साहब आपने अपनी ग...... में ये सब ऐसे कई डायलाग हैं जिन पर दर्शक हंसते और ताली बजाते हैं, मुन ऋषि और सुधीर मिश्रा ने फिल्म के लिए कई उम्दा संवाद लिये है, पर उनके संवादों में एक बुराई यह हैं कि फिल्म के ज्यादप्तर किरदार पूरी फिल्म में अपशब्दों (यानि की गाली गलौच) का बेजा इस्तेमाल करते है, जिसकी कोई जरूरत नहीं है अगले फिल्म के कुछ दृश्यों में सीन की डिमांड होने परद गाली गलौच होती तो शायद वो ठीक लगती, पर इस फिल्म में ऐसा लगता हैं कि किरदार जबरदस्ती गाली दे रहे हैं, वहीं इस फिल्म में अरूणोदय सिंह और अदिती राव हेदरी के बीच 22 स्मूचिंग सीन हैं, जिनकी फिल्म में कोई भी जरूरत नहीं, हालांकि इसके और गालियों के उपयोग के कारण फिल्म सेन्सर बोर्ड ने इस फिल्म को ड्डसर्टिफिकेट दिया है (एडल्ट सर्टिफिकेट)। इस फिल्म में कुछ सीन आपको हसाने पर मजबूर हसाने को मजबूर कर देंगे, जैसे कि वो सीन जहां ईरफान खान और चितरागदा मरे हुए आदमी के अगूठे का निशान लेते हैं, जैसे वो सीन जहां ईरफान खान बीच सडक़र पर अपनी गाड़ी के ऊपर बैठे है, वो सीन जहां विपिन शर्म अंग्रेजी बोलने की कोशिश करते हैं। इस फिल्म का गीत-संगीत निशात खान और अभिषेक रे तैयार किया है जो कि काबिले तारीफ है, इस फिल्म के लिए स्वानन्द किरकिरे और मनवेंद्र ने फिल्म परिस्थितियों के हिसाब से अच्छे अर्थपूर्ण गीत लिखे है, हालाकि आपको फिल्म के ज्यादातर गीत टुकडे-टुकड़ों में अलग-अलग जगह बैग्राऊंड में सुनाई देंगे। वैसे तो ईरफान खान, चित्रांगदा ङ्क्षसग और अरूणोदय ङ्क्षसग ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है, पर इनके अलावा सुशान्त ङ्क्षसग, सौरव शुक्ला और विपिन शर्मा ने भी फिल्म के अहम किरदारों को अदा किया है, ईरफान खान ने फिल्म में अपने द्वारा निभाए गए किरदार को जिया है, फिल्म में उनका अभिनय देखने लायक है खास तौर पर उनकी संवाद अदायगी (डायलोग डिलेवरी स्टाइल) वहीं अरूणोदयङ्क्षसह और चित्रांगदा ङ्क्षसह का अभिनय ठीक ठाक हैं। इस फिल्म की दूसरी अभिनेत्री अदिति राव हेदरी ने इस फिल्म कमाल का अभिनय किया है, इस फिल्म में सुशान्त सिंह ने बेहद उम्दा अभिनय किया है सुशान्त का अभिनय पूरी फिल्म में देखते ही बनता है, वही फिल्म में विपिन शर्मा का अभिनय आपको भा जाएगा। वैसे तो यह फिल्म की कहानी और स्क्रीन प्ले क्लासेस के लिए हैं पर इसके संवाद मासेस को ध्यान में रखकर लिखे गए हंै, और इसी खिचड़ी के कारण ये फिल्म न तो मासेस को बहुत ज्यादा पसन्द और न ही क्लासेस को ज्यादा पसन्द आएगी, इस फिल्म का नाम ‘‘दिल दर बदर’’ रखें या ‘‘ये साली जिन्दगी’’ रखे (इसके लिए सुधीर मिश्रा ने एक सोशल नेटवर्किंग साईट पर आपने मित्रों और आम जनता से इस फिल्म का प्रोमों देखकर इन दोनों में से एक नाम चुनने को कहा था, और ज्यादातर लोगों ने कहा की इस फिल्म का नाम ‘‘ये साली जिन्दगी’’ होना चाहिए) उसी तरह सुधीर मिश्रा की फिल्म को देखकर लगता है कि इस फिल्म को बनाते समय भी सुधीर मिश्रा बेहद कन्फ्यूज रहे कि वे क्या बनाना चाहते हंै, और इसी कारण सुधीर मिश्रा ने एक क्नफ्यूज सी फिल्म बनाई है, जिसमें साली तो है (मतलब खूब गाली गलौज) पर जिन्दगी नहीं हैं (मतलब फिल्म में दम नहीं हैं) पर अगर आप अच्छे संवाद और उम्दा अभिनय देखना चाहते हैं तो इस फिल्म को देख सकते हैं।
फिल्म समीक्षक-अंकित मालवीय
Email: Id ankkitmalviyaa@gmail.com
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Friday, January 28, 2011

Sunday, January 23, 2011

DHOBI GHAT REVIEW

Friday, January 14, 2011

YAMALA PAGLA DEEWANA REVIEW


निर्देशक-समीर कार्णिक,निर्माता-नितिन मनमोहन,समीर कार्णिक,लेखक-जसविंदर सिंह,छायांकन-कबीर लाल,संगीत-लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल,अनु मलिक,सन्देश शांडिल्य,नौमान जावेद, आर.डी.बी, राहुल बी सेठ,गीत-आनंद बख्शी, धर्मेंद्र, अनु मलिक, कामिल,नौमान जावेद, आर.डी.बी, राहुल बी सेठ,एडिटर-मुकेश ठाकुर, कला निर्देशक -जितेंद्र कावा, पार्श्व संगीत-संजोए चौधरी,एक्शन-अनालारसू,कोरियोग्राफी-बास्को-सीज़रकास्टयूम-तानिया देओल,शमायल खान,नीतू रोहरा,गगन ओबेराय इरशाद,निकुंज व्यास,शांतनु-निखिल

इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्म ‘‘यमला पगला दिवाना’’ के पहला प्रोमो 5 नबंवर 2010 को पहली बार सिनेमाघरों में दिखाया गया था और जिस किसी ने भी इस फिल्म का प्रोमो देखा, वह सभी लोग 14 जनवरी 2010 (यमला पगला दीवाना की की रिलिज डेट) का बेसबरी से इंतजार कर रहे थे, क्योंकि इस फिल्म प्रोमो गजब के थे, और हर आदमी जिसे फिल्में देखने का शौक है , इस फिल्म के सभी प्रोमोज को बार बार बार देखना चाहता था, इस फिल्म के प्रोमो की सबसे बडी सखसियत यह थी कि इसमें दर्शकों ने धर्मेन्द्र ,सनी देओल और बाबी देओल को एक साथ कॉमेडी करते हुए पहली बार देखा, हालांकि 2007 में इन तीनों (धर्मेन्द्र सनी और बॉवी) कि फिल्म ‘‘अपने’’ रिलीज हुई थी, जिसे दर्शकों ने बेहद पसंद किया था, पर इस बार यह तीनों दोओल ( धर्मेन्द्र सनी और बाबी ) को ‘‘यमला पगला दीवाना’’ में कमेडी करते हुए देखने के लिए दर्शक बेताव थे, इस फिल्म का नाम ‘‘यमना पगला दिवाना’’ धर्मेन्द्र की ही फिल्म ‘‘प्रतिज्ञा’’ जो कि 1975 में रिलीज हुई थी के एक गाने‘‘ मैं जट यमला पगला दिवाना’’ से लिया गया है। मैं आपको इस फिल्म की कहानी बताकर आपको इस फिल्म को देखने का मजा किरकिरा नहीं करना चाहता, पर आपको यह जरूर बताना चाहता हूॅ कि जैसा कि इस फिल्म के पोस्टर पर लिखा है, ‘‘दुनिया वालों इस फिल्म में कॉमेडी है एक्शन है , रोमान्स है, ड्रामा है, मेेैलो ड्रामा, है इमोश्न है और मॉ कसम बहुत सारा कन्फयूजन है‘‘ यह बात बिलकुल सही है, हालांकि जब आप इस फिल्म को देखेगें तो फिल्म का पहला हाफ (इंटरवल से पहले ही फिल्म) आपको काफी स्लो लगेगी, और हो सकता है कि आपको यह एक उबाऊ फिल्म लगे पर ऐसा बिलकुल नहीं है क्योंकि ‘‘यमला पगला दीवाना’’ अपने सेकण्ड हाफ ( इन्टरवर के बाद कि फिल्म ) आपको अपना दिवाना बना देगी, ‘‘यमला पगला दिवाना ’’’ इंटरवल के बाद गति पकड़ती है और इंटरवल के बाद आपको इस फिल्म में एक से बढकर एक कामेडी एक्शन और एमोश्नल सीन्स देखने को मिलेगें, इस फिल्म के कई एक्शन सीन ऐसे भी है जिन्हें देखकर आप लोट पोट हो जाएगें और खूब तालिया भी बजाएगें, जैसे कि वो सनी जहां सनी गुन्डो की पिटाई करते है वे सीन जहां सनी अंग्रेजी में अपने भाई के रिश्ते की बात करते है, जैसे की वो सीन जहां सनी अंग्रेजी में चुनाव सभा में बोलते है जैसे की वो सीन जहां सनी देओल को शराब चड जाती है। वो सीन जिसमें धर्मेन्द्र लीवर को ठगते है, वो सीन जिसमें सनी की विदेशी बीवी हिन्दी में बात करती है, इस फिल्म में सनी देओल स्टाईल के कई एक्शन सीक्वेंन्स है जो कि आपको बेहद पसंद आयेगे, फिल्म मे ंधर्मेेन्द्र के भी कई एक्शन ओर कामेडी सीन्स आपको कमाल के लगेगें, वही बॉवी देओल के रोमेन्टिक और कामेडी दृश्यों को भी आप पसंद करेगें, अनुपम खेर और मुकुल देव के भी कुछ सीन्स आपको बेहद भा जाएगें, इस फिल्म में कई उन्दा इमोश्नल ड्रामा और मैलोड्रामा वाले सीन भी है। इस फिल्म मेे धर्मेन्द्र का अभिनय कमाल का है उन्होने जहां एक और भरपूर कामेडी की है, ड्रामा किया है तो वहीं फिल्म के इमोश्नल सीन्स में उनके लजबाव अभिनय ने जान डाल दी है, धर्मेन्द्र को देखकर लगता ही नही की वह 75 साल के है, वह इतनी उम्र होने के बावजूद भी बेहद खूबसूरत लगते है और इस फिल्म में उनके काम को देखकर लगता है कि वह हमारे देश के सबसे बडे और नेचुरल एक्टिग करने वाले अभिनेताओं में से एक है , इस फिल्म के एक्शन सीन में उन्होने 75 साल की होते हुए भी अच्छा एक्शन किया है और फिल्म के कुछ गानों में उन्होने अपनी पुरानी धर्मेन्द्र स्टाइल में डान्स भी किया है और उनके डान्स को देखकर लगता है कि उन्होने क्या खूब डान्स किया है, इस फिल्म मे ंधर्मेन्द्र से कंधे से कंधा मिलाते हुए सनी देओल ने भी कमाल का अभिनय किया है, फिल्म के एक्शन सीन्स और कामेडी सीन्स देखकर आप सनी के फेैन बन जाऐगे, उनकी डायलाग डिलेवरी स्टाइल और उनकी मुंह से निकले ‘‘जट रिस्की अफसर बाल्टी विस्की‘‘ जैसे कई संवाद सुनकर आप हस हंस के पागल हो जायेगे, वही ंफिल्म के क्लामैक्स सीन में भी सनी ने गजब का अभिनय किया है, खासतौर से जब सनी फिल्म के क्लामैक्स सीन में अपनी सनी देओल स्टाईल में चिल्लाते है, वो भी देखने लायक है, इस फिल्म में बॉवी देओल ने भी अच्छा अभिनय किया है, वह कॉमेडी सीन्स और कुछ रोमेन्टिक सीन्स में अच्छे लगते है। इस फिल्म कि हीरीईन कुलजीत राणधावा की यह पहली हिन्दी फिल्म है, इससे पहले कुलजीत ‘‘करीना करीना’’ नामक टीवी सीरियल और 2006 मे एक पंजाबी फिल्म में बतौर हिरोइन काम कर चुकी है, इस फिल्म में कुलजीत बेहद खूबसूरत लगती हे औ फिल्म में उन्होने अभिनय भी किया हेै।
फिल्म के अन्य कलाकारों में अनुपम खेर ने सरदार की भूमिका को जिया है, वही मुकुल देव का अभिनय भी देखने लायक है फिल्म में जॉनी लीवर का रोल छोटा है पर उन्होने उसमें भी गजब का अभिनय किया है, मॉ की भूमिका में नफीसा अति ने भी अच्छा अभिनय किया है, फिल्म में सनी की पत्नि की भूमिका निभाने वाली आस्टेलियन अभिनेत्री ऐमा ने छोटे से किरदार को भी तरीके से निभाया है, खासतौर पर उनके मुंह से निकली हिन्दी भाषा आपको भा जाएगी, फिल्म में पोली का किरदार निभाने वाली सुचित्रा खन्ना और विन्द्रा का किरदार निभा रहें अमित मिस्त्री को भी आप उनके दृश्यों में कमाल करते हुए देखेगें, इस फिल्म के गानों में ‘‘यमला पगला दीवाना’’ ‘‘टिंकू जिया’’ आपको बेहद पसंद आयेगें और ‘‘चड़ा दे रंग’’ भी ठीक ठाक ही लगेगा, पर इस फिल्म के टाईटल सांग ‘‘यमला पगला दीवाना’’ में तीनों देओल को अपन-अपने अंदाज में डान्स करते देखना अच्छा लगेगा, आप इस गाने को देखने के लिए इस फिल्म को फिर से देख सकते है, इसकी कोयोग्राफी तारिफे काबिल है। लगभग 24 करोड बजट की इस फिल्म को देखते हुए आपको इसकी और एक बात बेहद पसंद आएगी वो है, इस फिल्म के रंग-बिरंगे सुन्दर-सुन्दर कास्टयुम्स जो कि फिल्म के चरित्रों के हिसाब से तैयार किये गये हैं और वो उन पर जचते भी हैं। यहॉ मैं आपको एक बात और बताना चाहूॅगा, लगभरग 24 करोड लागत की इस फिल्म को इसके निर्माताओं ने इसके रिलीज के पहले ही इस फिल्म को बेच कर इसकी लागत वसूल ली है इसके बाद अब निर्माताओं को जो भी कमाई होगी वह फिल्म का प्रोफिट होगा। इस फिल्म का निर्देशन समीर कर्णीक ने किया है और बतौर निर्देशक यह उनकी पॉचवी फिल्म है, इससे पहले ‘‘क्यों हो गया ना’’ (2004), ‘‘नन्हे जैसलमेर’’ (2007), ‘‘ हीरोज ’’(2008),’’ वादा रहा’’ (2009), का निर्देशन कर चुके है और उनकी पहली फिल्म ‘‘क्यों होगया न’’ के अलावा उनकी हर फिल्म में देओल परिवार ( धर्मेेन्द्र, सनी, बाबी ) के किसी न किसी सदस्य ने अभिनय किया है। ’’यमला पगला दीवाना’’ में समीर ने पहली बार तीनो देओल को साथ में लिया और एक कामेडी फिल्म बनाने की कोशिश की है, इस फिल्म का फस्ट हाफ काफी स्लो है, बस यही इस फिल्म की एक बडी कमजोरी है इटरवल के बाद समीर कर्णीक की फिल्म कमाल की फिल्म लगती है, जो कि आप अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते है, हालाकि यह फिल्म मासेस की फिल्म है क्लास वाले शायद ही इसे बेहद पसंद करें यह फिल्म सिंगल सिक्रन पर बहुत चलेगी खास तौर से पंजाब, हरियाणा, यू.पी., बिहार, मध्यप्रदेश, के दर्शकों को यह फिल्म बहुत पसंद आएगी। मल्टीप्लेक्स आडिन्यस इस फिल्म को उतना पसंद नही करेंगे। जितना की सिंगल सिक्रिन के आडियन्स, आप से गुजारिश है कि इस फिल्म को देखने जायें तो दिमाग ना लगायें केवल मनोरंजन के लिए इस फिल्म को जरूर देखें। इस फिल्म की सबसे बडी खासियत यह है कि इस फिल्म मे ंएक भी द्विअर्थी संवाद (डबल मिनिग डायलाग) नहीं है और न ही कोई उलजलूल सीन है, जिसके लिए समीर कर्णीक बधाई के पात्र हैं, कि उन्होंने एक साफ सुथरी कॉमेडी फिल्म बनाई है।

फिल्म समीक्षक - अंकित मालवीय
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